Monday, November 24, 2014

काँटा

एक काँटा
रखना है
इस बार खरीदके
साढ़े छ: इंची
मूँछ निकलते सोचा था ...

स्टेशन के पुलियाँ बज़ार
अम्मी मजबूत
पूंछा,
इसका दाम बता
ओ बोल्ली
आप कमाई है
तो खरीद
बाप कमाई है
तो वंटास
तब मैं
वंटास
हुआ था...


दुनिया जालिम हुई
तो काँटा खरीदा
साढ़े छ: इंची
आप कमाईका
साढ़े छ: इंची लेके
पुलियाँ तले
युसुफ मियाँ...
तेज़ बना मियाँ
तरबूज नय काँटना
मियाँ बोला
पेट तरबूज से नर्म
और गला
मलाई के माफ़िक
क्या कांटेगा?

मैं बोला
साल्ला झेन्नुम से
एक जमात
गल्तिसे जमीं पे
हग रहेली है
उसका खात्मा करूँ

 मियाँ बोला
उस्से क्या होगा बेवकूफ़ !
तू एक मारेगा
ओ दस पैदा करेगा
नेक होगा
सीद्दा ऊपर जा
उसकुच चिपका
करे के मियाँ
मेरेकुच चिपका डाला ....


... जब से झेन्नुम
तलाशता फ़िर्रा
साढ़े छ: इंची लेके
तुम ज़मीं से ऊपर भेजो
मैं चिपका डालूँगा

ज़मी भी साफ
झेन्नुम भी...

उतनी ज़न्नत की तू देख


- बारकवी

इब्सेन

'साहित्य' च्या विंगेत
उभा होता इब्सेन,
परंपरेचं पिकलं पान,
बिन केसांचा म्हातारा,
रूढींचा आंधळा...
कमानी जात्यावर,
भरडत होता गीत,
संकेताचं...


तिकडून आलं पात्र,
मरतुकडं
इंटररिलेशनची
लूत भरलेलं,
मेलोड्रामाचे
गँगरीन झालेलं,


आणि खाऊ लागलं मीठ
नाटकाचं त्याच्या .....


- बारकवी

मेरा देश महान ...




धर्म, प्रांत, भाषा, बोली के खूब खो अभिमान ,
प्रांतवाद हर मन में रखकर कौए बाटत ज्ञान।
पंद्रह अगस्त आते ही झड दो देशभक्ति का प्लान। ललकारो अपने ही आँगन- मेरा देश महान ।।

कौओं की का-का को दे दो कुहु- कुहु सा मान
कोयल भी बोले मैं कौआ, का-का ही हो गान   
अपमानित हो सभ्य यहाँ और झूठों का सन्मान
ललकारो अपने ही आँगन- मेरा देश महान ।। 
                              
- बारकवी    

तंगड़ी आलिशान ...




तंगड़ी आलिशान, भुना दो तंगड़ी आलिशान
पहले ही दिन सावन के, व्रत का हो बलिदान-
भुना दो तंगड़ी आलिशान...

मछली का बाज़ार भरा, खाली न यूँ पड़ जाय
तरकारी से सस्ती मच्छी, कब तू लेने पाय
सावन महीने की मस्ती में जिव्हा न करना दान
भुना दो तंगड़ी आलिशान

बार बना फूल हैपी अवर्स, चाहे हो दिन-रात
धंधे के सूखे पर दे दी, शेट्टी ने कर मात
मौके-चौके वक़्त व्यर्थ क्यूँ रहना परेशान
भुना दो तंगड़ी आलिशान

-बारकवी